बारिश की एक शाम..
मिट्टी की खुश्बू.... घर का आँगन.... अंगीठी से निकलता सौंधा सौंधा धुँआ .... और तुम... सफ़ेद कुर्ते में...
मिट्टी की खुश्बू.... घर का आँगन.... अंगीठी से निकलता सौंधा सौंधा धुँआ .... और तुम... सफ़ेद कुर्ते में...
हाथ में कागज़ों का बंडल लिए कुछ सोचते हुए .... कुछ लिखते हुए....
कभी नाक पर उतरते ऐनक को ऊपर सरकाते तो कभी चाय की चुस्की लगाते....अपने ही लेख में गुम....
कभी नाक पर उतरते ऐनक को ऊपर सरकाते तो कभी चाय की चुस्की लगाते....अपने ही लेख में गुम....
....और मैं... तुम्हारे ठीक सामने रोलिंग चेयर पे चाय पीती हुई .. सिर्फ तुम्हे देखती और बस देखती रहती.....
तुम्हारे व्यक्तित्व के हर एक बात में सराबोर ,खोई हुई, इंतज़ार करती के कब वो लेख पूरा होगा... और तुम्हारा ध्यान मुझपे आएगा,....
तुम वो कागज़ों का बंडल टेबल पर रखते ,, फिर कहते Ritti पढ़ो तो ज़रा,,
बताओ तो कैसा लगा तुम्हे...??
बताओ तो कैसा लगा तुम्हे...??
"ऐसे तो हमेशा से ही बोहोत attention
मिलता रहा है मुझे तुमसे,, पर लेख ख़त्म होने का हमेशा से कुछ ज्यादा ही इंतज़ार रहता था"
क्यूँकि, तुम्हारा लेख सब से पहले ..मुझे जो.. पढ़ने को मिलता था,,
ये किसी अवॉर्ड जितने से कम नहीं रहा मेरे लिए....
क्यूँकि, तुम्हारा लेख सब से पहले ..मुझे जो.. पढ़ने को मिलता था,,
ये किसी अवॉर्ड जितने से कम नहीं रहा मेरे लिए....
मैं हाथ में तुम्हारा लेख लिए.... तुम्हारे सोच को शब्दों में देख कर बस गुम हो जाती ,..
सोचती.... के .... इतनी आसानी से कोई अपनी सोच को कैसे शब्द दे सकता है,,,
और तुम सब .. जान-समझ कर भी अंजान.....मुस्कराकर एक और चाय की demand करते...
...आज भी सब से पहले मै ही पढती हु तुम्हारे सारे लेख......बस अंतर इतना है कि तुम्हे सामने नहीं देख सकती...
Reason: ...तुम्हारे लिखावट की जगह 'MS Word' के '' 'FONTS' ने ले ली है और काग़ज़ों की जगह 'MAILS' ने,,
वैसे आज भी ज्यादा कुछ बदला नहीं है…
कम से कम मेरे लिए तो नहीं....
मेरे लिए तो,,, तुम आज भी वही हो,,,
सब से ख़ास....
कम से कम मेरे लिए तो नहीं....
मेरे लिए तो,,, तुम आज भी वही हो,,,
सब से ख़ास....
RiTti :)
Kyonki tumhara lekh sabse pehle mujhe jo padhne ko milta tha :) :) :)
ReplyDelete"Ditto" :*